उत्तराखंड में फिर बढ़ा खतरा, समय बम की तरह फटने को तैयार 13 ग्लेशियर झीलें

हाल ही में नेपाल में आई कुदरत की तबाही ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। लेकिन नेपाल की इस तबाही ने उत्तराखंड के लिए एक बहुत बड़ा रेड़अलर्ट जारी कर दिया है। वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड में तबाही को लेकर एक ऐसा खुलासा किया है जिसने शासन प्रशासन की निंदे उड़ाकर रख दी हैं। … The post नेपाल के बाद अब उत्तराखंड पर मंडरा रहा है मौत का साया, फटने को तैयार 13 टाइम बम appeared first on Khabar Uttarakhand - Uttarakhand News.

Aug 31, 2026 - 00:34
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उत्तराखंड में फिर बढ़ा खतरा, समय बम की तरह फटने को तैयार 13 ग्लेशियर झीलें
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कम शब्दों में कहें तो, नेपाल में आई भयानक आपदा ने उत्तराखंड के लिए चौकसी बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यहां के 13 ग्लेशियर झीलें खतरे के संकेत दे रही हैं, जिनमें से कुछ कार्यवाही के लिए तैयार हैं। यह स्थिति शासन-प्रशासन की निंदाएं उठाने के लिए काफी है।

नेपाल की तबाही से उत्पन्न खतरा: उत्तराखंड पर मंडराता साया

हाल ही में नेपाल में आई कुदरती तबाही ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। इस घटना ने उत्तराखंड के लिए एक गंभीर रेड अलर्ट जारी कर दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, नेपाल जैसा भयावह नजारा उत्तराखंड में भी देखने को मिल सकता है।

नेपाल में आए संकट की गूंज

नेपाल की तबाही ने वैश्विक स्तर पर डर का माहौल बना दिया है। इस संदर्भ में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) द्वारा किए गए सैटेलाइट अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह अध्ययन इस बात को रेखांकित करता है कि उत्तराखंड के ऊँचे हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने की दर में तेजी आई है।

उत्तराखंड में बढ़ता बर्फ का पिघलना

उत्तराखंड के ऊँचे हिमालयी इलाकों में बर्फ पिघलने की गति अब खतरनाक होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ने पहाड़ों के हरारिक सिस्टम को प्रभावित किया है, जिससे कई ग्लेशियर झीलें बन गई हैं। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनका पानी पहाड़ों के बीच में बड़े गड्ढों में जमा हो जाता है।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट का खतरनाक प्रभाव

जब पानी की मात्रा बढ़ती है या किसी एवलांच के कारण ये झीलें टूटती हैं, तो यह करोड़ों लीटर पानी के बाढ़ के रूप में बस्तियों की ओर तेजी से बहने का कारण बन सकती हैं, जिसे विज्ञान में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। 2013 में केदारनाथ में भी ऐसा ही हुआ था।

सरकार की सतर्कता

केदारनाथ त्रासदी के बाद से ही केंद्र और राज्य सरकार ग्लेशियर झीलों पर कड़ी नज़र बनाए हुए हैं। हालिया रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के अनुसार, उत्तराखंड में 1200 ग्लेशियर झीलों में से 13 को संवेदनशील और अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।

ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने इन झीलों की वैज्ञानिक रूप से निगरानी एवं अध्ययन शुरू कर दिया है। आगामी वर्षों में चार ग्लेशियर झीलों का सर्वेक्षण किया गया है। यहां की नदियों के चार बेसिन में रिकवरी के प्रयास किए जा रहे हैं:

  • अलकनंदा बेसिन: 226 झीलें
  • भागीरथी बेसिन: 131 झीलें
  • धौलीगंगा बेसिन: 19 झीलें
  • कुटियांगती बेसिन: 18 झीलें
  • मंदाकिनी बेसिन: 12 झीलें
  • गौरीगंगा बेसिन: 9 झीलें
  • भिलंगना बेसिन: 5 झीलें
  • टौंस बेसिन: 4 झीलें
  • यमुना बेसिन: 2 झीलें

बजट की स्वीकृति

खतरे की गंभीरता को देखते हुए भारतीय सरकार ने उत्तराखंड के लिए 30 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया है, जिसमें 90% फंड केंद्र सरकार और 10% राज्य सरकार का होगा।

ऊर्जा आपूर्ति की चुनौती

हालांकि, ग्लेशियर झीलों पर मॉनिटरिंग उपकरण लगाने में ऊर्जा की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। दुर्गम क्षेत्रों में सामान्य संचार माध्यमों की अनुपस्थिति के कारण रियल टाइम डेटा का सीमित पहुंचना भी दिक्कत उत्पन्न कर सकता है।

आपदा के बाद की तैयारी

नेपाल की आपदा के बाद उत्तराखंड सरकार ने नियमित एवं वैज्ञानिक निगरानी के लिए दिशा निर्देश दिए हैं, ताकि संभावित आपात स्थितियों के लिए तैयार रहें।

जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा

हिमालय में मौसम के तेज़ी से बदलने और ग्लेशियरों के जलने की प्रक्रिया से खतरे उभर सकते हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययनों ने यह स्पष्ट किया है कि विस्तृत जांच और सर्वेक्षण का कार्य आरंभ हो चुका है।

वे समय तंत्र की भूमिका

स्थानीय चेतावनी तंत्र और निकासी मार्ग की पहचान करना भी अत्यंत आवश्यक है, ताकि संभावित GLOF के दौरान तत्काल कार्रवाई हो सके। उत्तराखंड को केदारनाथ और थराली जैसी आपदाओं ने यह सीख दी है कि समय पर चेतावनी कितनी महत्वपूर्ण है।

हालांकि, इस क्षेत्र में कार्य सटीक होना चाहिए। खतरनाक झीलों पर दिन-रात निगरानी और सटीक डेटा सुनिश्चित करना हर नागरिक की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

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प्रणाम,

टीम खर्चा पानी

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