क्या हरदा की सियासी पारी अब खात्मे की ओर ? संन्यास के पुराने बयानों ने फिर पकड़ा जोर

उत्तराखंड की राजनीति में “हरदा” के नाम से मशहूर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में हैं। संन्यास के पुराने बयानों और हाल में संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश को लेकर चल रही सियासी चर्चाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्तर … The post क्या हरदा की सियासी पारी अब खात्मे की ओर ? संन्यास के पुराने बयानों ने फिर पकड़ा जोर appeared first on Khabar Uttarakhand - Uttarakhand News.

Sep 12, 2026 - 18:34
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क्या हरदा की सियासी पारी अब खात्मे की ओर ? संन्यास के पुराने बयानों ने फिर पकड़ा जोर

उत्तराखंड की राजनीति में “हरदा” के नाम से मशहूर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में हैं। संन्यास के पुराने बयानों और हाल में संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश को लेकर चल रही सियासी चर्चाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में चल रहे इस सियासी योद्धा की पारी अब खात्मे की ओर है?

संन्यास की पुरानी अफवाहें और इस्तीफे का नया मोड़

हरीश रावत की राजनीति का एक खास तरीका रहा है-दबाव की राजनीति। पूर्व में भी जब-जब पार्टी आलाकमान या राज्य संगठन से उनकी अनबन हुई, उन्होंने सोशल मीडिया पर एकांतवास, संन्यास या राजनीति छोड़ने के संकेत देकर दबाव बनाया और अंततः अपनी बात मनवाई। इस बार विवाद का कारण राजनीतिक नहीं, बल्कि जांच एजेंसी की कार्रवाई है। उनके पूर्व OSD चंदन सिंह जीना के परिसरों पर ईडी  की छापेमारी में बरामदगी के बाद रावत ने नैतिक आधार पर सीडब्लूसी की स्थायी सदस्यता और राज्य कार्यकारिणी पद से हटने की पेशकश की। हालांकि, उन्होंने तुरंत यह भी स्पष्ट किया कि वे “कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता” नहीं छोड़ रहे हैं और पार्टी उनके खून में है।  

बीते दिनों जब उनकी सेहत ठीक न होने की बात सामने आई तो उन्होंने सोशल मीडिया पर बैडमिंटन खेलते हुए वीडियो पोस्ट कर एक सोची-समझी रणनीति के तहत संदेश दिया कि सियासत में अभी तो मैं जवान हूं। यानी वे अपने विरोधियों और पार्टी के भीतर प्रतिद्वंद्वियों को यह संदेश देना चाहते हैं कि बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी शारीरिक और राजनीतिक सक्रियता कम नहीं हुई है। रावत जानते हैं कि पहाड़ी राजनीति में जनता से जुड़ाव और निरंतर दृश्यता (विजिबिलिटी) ही सबसे बड़ा हथियार है। बैडमिंटन कोर्ट से लेकर जलेबी बनाने तक की उनकी तस्वीरें उन्हें मीडिया और जनता की चर्चा में बनाए रखती हैं।

कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और रावत की घेराबंदी

उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी से जूझ रही है। रावत के खिलाफ पार्टी का एक धड़ा लगातार इस बात की वकालत कर रहा है कि अब नेतृत्व परिवर्तन होना चाहिए। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में मिली हार और खुद रावत के अपनी सीटें न जीत पाने के कारण, विरोधी गुट को उनकी घेराबंदी का मौका मिला।

ये खबर भी पढ़ें: छापेमारी, इस्तीफे की पेशकश और तीखे वार, हरीश रावत के बयानों से राजनीतिक घमासान

सियासी पिच को बचाने की एक और पैंतरेबाजी

क्या हरीश रावत की राजनीति खत्म हो जाएगी? यह एक बड़ा सवाल रहा है 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में व्यक्तिगत हार से उनके जनाधार पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन पूरे उत्तराखंड में आज भी वह कांग्रेस का सबसे जाना-पहचाना और लोकप्रिय चेहरा हैं। कहा जाता है कि उन पर सीबीआई और पूर्व सहयोगियों पर ईडी और भ्रष्टाचार के आरोपों से छवि को धक्का लगा है लेकिन वह ऐसे आड़े वक्त में दबाव के क्षणों में खुद को ‘विक्टिम’ की तरह पेश कर सहानुभूति कार्ड खेल जाते हैं इस तरह जनसमर्थन हासिल करने की कला में पारंगत हैं। पार्टी के भीतर युवा पीढ़ी यानी  नए नेता रावत के प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश करते रहे हैं किंतु हरदा का राजनीतिक चातुर्य यह है कि उन्हें अंतिम समय में बाजी पलटने और आलाकमान को साधने में महारत हासिल है।

ऐसे में देखें तो हरीश रावत की राजनीति को इतनी आसानी से समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी। भले ही वे कानूनी, उम्र से जुड़े और पार्टी के अंदरूनी मोर्चों पर चौतरफा चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, लेकिन जब तक उत्तराखंड कांग्रेस में उनके कद का कोई सर्वमान्य विकल्प तैयार नहीं होता, तब तक हरदा राज्य की राजनीति में अप्रासंगिक नहीं हो सकते। यह इस्तीफा उनका अंत नहीं, बल्कि अपनी सियासी पिच को बचाने की एक और पैंतरेबाजी है।

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