उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: धन सिंह या गोदियाल ?, कठिन हो गई श्रीनगर की राह
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की लेकर सियासी उठापटक जारी है। हम आपको अपने इस खास सेगमेंट में उत्तराखंड की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों का सियासी हिसाब किताब बता रहे हैं। आइए आज समझते हैं इस बार श्रीनगर विधासभा सीट पर क्या स्थिति बनने जा रही है। वोटर लिस्ट से 9,819 नाम कटे, क्या 587 वोटों … The post उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027: धन सिंह या गोदियाल ?, कठिन हो गई श्रीनगर की राह appeared first on Khabar Uttarakhand - Uttarakhand News.
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की लेकर सियासी उठापटक जारी है। हम आपको अपने इस खास सेगमेंट में उत्तराखंड की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों का सियासी हिसाब किताब बता रहे हैं। आइए आज समझते हैं इस बार श्रीनगर विधासभा सीट पर क्या स्थिति बनने जा रही है।
वोटर लिस्ट से 9,819 नाम कटे, क्या 587 वोटों से जीती सीट पर पलटेगा बाजीगर ?
उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल क्षेत्र की सबसे हाई-प्रोफाइल और चर्चित सीटों में शुमार श्रीनगर विधानसभा सीट पर अचानक एक बड़ा सियासी भूचाल आ गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान इस सीट से एकाएक 9,819 वोटरों के नाम कट गए हैं। जिस सीट पर 2022 के विधानसभा चुनाव में हार-जीत का फैसला महज 587 वोटों के मामूली अंतर से हुआ हो, वहां करीब दस हजार वोटों का बाहर होना किसी राजनीतिक विस्फोट से कम नहीं है। यह अकेला आंकड़ा पूरे चुनाव के नतीजे और सियासी गणित को उलट-पुलट करने का दम रखता है।
गढ़वाल का शैक्षणिक और सांस्कृतिक केंद्र मानी जाने वाली इस सीट पर कटा यह वोट बैंक किसी भी दल के लिए जीत-हार की नई कहानी लिख सकता है। शायद यही वजह है कि अक्सर चर्चा हो रही है कि सिटिंग विधायक व कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत किसी सुरक्षित मैदानी सीट की खोज में हैं।
587 के मुकाबले 16 गुना बड़ा आंकड़ा, समझें सियासी गणित
2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी डॉ. धन सिंह रावत को 29,618 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के गणेश गोदियाल को 29,031 वोट मिले थे। महज 1 प्रतिशत से भी कम (587 वोट) के अंतर से कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत चुनाव जीते थे। अब एसआईआर प्रक्रिया के तहत जो 9,819 नाम कटे हैं, वह 2022 के जीत के अंतर से लगभग 16 गुना अधिक हैं। सवाल उठ रहे हैं कि यदि कटे हुए वोटों में अधिकतर प्रवासी छात्र, हॉस्टल में रहने वाले युवा, स्थानांतरित कर्मचारी या पारंपरिक वोट बैंक से जुड़े लोग थे, तो इसका खामियाजा किस दल को भुगतना पड़ेगा?
अस्थाई आबादी और पलायन की मार
श्रीनगर में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज और एनआईटी जैसे बड़े संस्थान हैं। एसआईआर प्रक्रिया के तहत अनुपस्थित , स्थानांतरित या मृत सूची में दर्जनों ऐसे वोटरों के नाम हटे हैं जो लंबे समय से हॉस्टल या किराए के मकानों में रह रहे थे। इसके अलावा, पैठाणी और थलीसैण जैसे ग्रामीण बेल्ट से देहरादून या अन्य मैदानी इलाकों में पलायन कर चुके लोगों के नाम कटने से भी यह संख्या इतनी विशाल हुई है। इतने बड़े पैमाने पर नाम कटने के बाद श्रीनगर में राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू होना तय है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल और कांग्रेस इस मुद्दे को प्रशासनिक स्तर पर उठा रहे हैं। पार्टी बूथ स्तर पर आपत्तियां दर्ज कराने और ‘फॉर्म 6’ के जरिए वैध प्रवासियों व छात्रों के नाम वापस जुड़वाने के लिए अभियान चलाएगी। वहीं भाजपा इसे निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है। पार्टी का तर्क है कि दोहरी प्रविष्टियों (फर्जी वोटों) को हटाना एक संवैधानिक प्रक्रिया है। हालांकि, भाजपा का अपना बूथ-स्तरीय कैडर भी इस बात पर सतर्क है कि कहीं उसके पारंपरिक मतदाता सूची से बाहर न हो गए हों।
अब जैसे-जैसे चुनाव करीब आएंगे, श्रीनगर में एक-एक वोट की कीमत 2022 से भी कहीं अधिक हो जाएगी और कुल वोटर बेस सिकुड़ने से मतदान प्रतिशत बेहद निर्णायक साबित होगा।
यहां मुकाबला एकतरफा नहीं रहने वाला
श्रीनगर विधानसभा सीट पर पहले बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस का कब्जा रहा है। लेकिन 2017 से यह डॉ. धन सिंह रावत के कब्जे में है लेकिन यह सीट हमेशा से व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता और कांटे की टक्कर की गवाह बनी है। 2012 में कांग्रेस के गणेश गोदियाल ने भाजपा के डॉ. धन सिंह रावत को 5,063 मतों के अंतर से हराया था। लेकिन 2017 में डॉ. धन सिंह रावत ने गोदियाल को 8,698 मतों से मात दे दी।
2022 का चुनाव तो इतना कांटे का रहा कि डॉ. धन सिंह रावत गोदियाल से महज 587 मतों से आगे रहे। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी श्रीनगर सीट के भीतर दोनों दलों के बीच केवल 698 वोटों की बढ़त का अंतर रहा था, जो साफ करता है कि यहां मुकाबला एकतरफा नहीं रहने वाला। शायद इसीलिए चर्चा होती रही है कि धन सिंह रावत पहाड़ से मैदान यानी रायपुर या डोईवाला सीट में पलायन कर सकते हैं।
जातीय और सामाजिक समीकरण
श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र राजपूत (ठाकुर) बहुल हैं, जो निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वहीं, पैठाणी, थलीसैण और शहरी क्षेत्रों में ब्राह्मण मतदाता भी अच्छी संख्या में हैं। यहां लगभग 15-16 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी हार-जीत का रुख तय करने में अहम है। बहुत संभव हो कि शुद्धिकरण विवाद का भी यहां असर हुआ हो। श्रीनगर शहर जहां मुद्दों और विकास पर वोट करता है, वहीं ग्रामीण बेल्ट में संगठन की पकड़ और व्यक्तिगत संपर्क से बाजी जीती जाती है।
मोहन काला की ‘कमल’ में एंट्री से बदला खेल
2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड क्रांति दल के प्रत्याशी मोहन काला ने 4,271 वोट हासिल किए थे। हार-जीत का अंतर सिर्फ 587 था, इसलिए काला द्वारा काटे गए वोटों ने परिणाम को बेहद रोचक बना दिया था। लेकिन अब मोहन काला भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इस घटनाक्रम ने श्रीनगर के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।
इस तरह देखें तो 4,000 से अधिक वोटों के प्रभाव वाले नेता का भाजपा में आना डॉ. धन सिंह रावत के वोट बैंक को बड़ी मजबूती देता है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर सीट में जो अंतर रहा वह कहता है कि शायद काला के भाजपा में आने से बहुत असर नहीं हुआ। लेकिन मोहन काला के पाला बदलने से यूकेडी का क्षेत्रीय आधार यहां कमजोर हुआ है, जिससे मुकाबला अब पूरी तरह से ‘भाजपा बनाम कांग्रेस’ के आमने-सामने के ध्रुवीकरण में तब्दील हो गया है।
स्थानीय मुद्दे जो तय करेंगे चुनावी हवा
श्रीनगर के मुख्य चुनावी मुद्दों में पौड़ी गढ़वाल जिले से जुड़ा बहुचर्चित अंकिता हत्याकांड, सशक्त भू-कानून और 1950 मूल निवास की मांग शामिल है, जो युवाओं के बीच बेहद संवेदनशील हैं। इसके अतिरिक्त, श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में सुपर-स्पेशलिटी सुविधाओं की कमी, डॉक्टरों के रिक्त पद, और पहाड़ी इलाकों में रोजगार के अभाव में लगातार हो रहा पलायन ऐसे मुद्दे हैं जिन पर जनता जवाब मांग रही है।
कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत अपने द्वारा कराए गए विकास कार्यों और मजबूत संघ पृष्ठभूमि के बल पर हैट्रिक लगाने के इरादे से मैदान में हैं, तो वहीं गणेश गोदियाल अपनी बेबाक शैली, व्यक्तिगत लोकप्रियता और जन-मुद्दों के सहारे वापसी की राह देख रहे हैं। ऐसे में 9,819 वोटों की इस बड़ी कटौती ने दोनों ही दिग्गजों की नींद उड़ा दी है और आने वाले दिनों में श्रीनगर की सियासत में ‘एक-एक वोट की जंग’ देखने को मिलेगी।
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