उत्तराखंड हाईकोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग पर फिर ब्रेक: केंद्र ने खारिज किया बेलबाबा का प्रस्ताव

उत्तराखंड उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) को नैनीताल की वादियों से निकालकर हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने की योजना पर एक बार फिर पानी फिर गया है। केंद्र सरकार की रीजनल इंपावर्ड कमेटी (आरईसी) ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए फिलहाल इस पर रोक लगा दी है। प्रदेश सरकार और न्याय व्यवस्था से जुड़े … The post उत्तराखंड हाईकोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग पर फिर ब्रेक: केंद्र ने खारिज किया बेलबाबा का प्रस्ताव appeared first on Khabar Uttarakhand - Uttarakhand News.

Oct 28, 2026 - 00:34
 159  2.8k
उत्तराखंड हाईकोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग पर फिर ब्रेक: केंद्र ने खारिज किया बेलबाबा का प्रस्ताव

उत्तराखंड उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) को नैनीताल की वादियों से निकालकर हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने की योजना पर एक बार फिर पानी फिर गया है। केंद्र सरकार की रीजनल इंपावर्ड कमेटी (आरईसी) ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए फिलहाल इस पर रोक लगा दी है। प्रदेश सरकार और न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि नैनीताल में स्थान की कमी के कारण लंबे समय से हाईकोर्ट को किसी सुलभ जगह पर स्थानांतरित करने की मांग उठ रही थी। कमेटी का मानना है कि यह प्रोजेक्ट ‘नॉन-साइट-स्पेसिफिक’ (गैर-स्थल-विशिष्ट) है, यानी इसके लिए केवल वन भूमि का ही उपयोग करना अनिवार्य नहीं था। कमेटी ने पाया कि राज्य सरकार और संबंधित एजेंसी ने हाईकोर्ट की इमारत के लिए गैर-वन भूमि (नॉन-फॉरेस्ट लैंड) को तलाशने के पर्याप्त प्रयास नहीं किए।

क्यों खारिज हुआ 30 हेक्टेयर जंगल का प्रस्ताव?

आरईसी ने वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के कड़े प्रावधानों का हवाला देते हुए इस प्रस्ताव को खारिज किया। दरअसल, लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के पक्ष में तराई केंद्रीय वन प्रभाग की भाखड़ा रेंज (लामाचौड़ ब्लॉक) के बेलबाबा क्षेत्र में 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के डायवर्जन का प्रस्ताव भेजा गया था। कागजों पर यह प्रस्ताव सभी अफसरों द्वारा हस्ताक्षरित और संस्तुत था। डीएफओ की रिपोर्ट में भी वन संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन से इनकार किया गया था और बताया गया था कि यह जमीन किसी नेशनल पार्क, टाइगर रिजर्व या हेरिटेज साइट का हिस्सा नहीं है। इस 30 हेक्टेयर वन भूमि पर कुल 123 पेड़ काटे जाने थे, जिनमें सबसे ज्यादा 75 पीपल, 9 सागौन के अलावा बकुली, बेल और सेमल के पेड़ शामिल थे। इसके एवज में नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) के तहत करीब 3.68 करोड़ रुपये का आकलन किया गया था। वहीं, करीब 3.46 करोड़ रुपये की लागत से 60 हेक्टेयर जमीन पर प्रतिपूरक वनीकरण (प्लांटेशन) की योजना बनाई गई थी। लेकिन इसके बावजूद पर्यावरण मानकों और वैकल्पिक भूमि की तलाश में ढिलाई के कारण कमेटी ने इसे हरी झंडी नहीं दी।

कमेटी के चार तीखे सवाल, जिन्होंने रोकी फाइल

रीजनल इंपावर्ड कमेटी ने फाइल का गहन अध्ययन करने के बाद राज्य सरकार और यूजर एजेंसी के सामने कई ऐसे सवाल रखे, जिनका संतोषजनक जवाब नहीं मिल सका:

हाथी कॉरिडोर पर संशय: कमेटी ने पूछा कि क्या यह क्षेत्र हाथियों के आवागमन (एलिफेंट कॉरिडोर) में आता है? इस पर वन विभाग ने माना कि स्थिति को अभी वेरिफाई (सत्यापित) किया जाना बाकी है।

मौजूदा हाईकोर्ट परिसर का क्या होगा? नैनीताल में वर्तमान में मौजूद ऐतिहासिक हाईकोर्ट भवन और उसकी जमीन का भविष्य क्या होगा? इस पर एजेंसी ने कहा कि शिफ्टिंग के बाद राज्य सरकार इस पर फैसला करेगी कि जमीन वन विभाग को वापस दी जाए या नहीं।

जब वनीकरण के लिए जमीन मिली, तो हाईकोर्ट के लिए क्यों नहीं? कमेटी ने तंज कसते हुए पूछा कि जब इसी तहसील क्षेत्र में पेड़ लगाने (प्रतिपूरक वनीकरण) के लिए गैर-वन भूमि मिल गई, तो हाईकोर्ट की इमारत के लिए खाली सरकारी जमीन क्यों नहीं खोजी जा सकी?

डीएम के सर्टिफिकेट पर असंतोष: यद्यपि जिलाधिकारी ने एक साथ 30 हेक्टेयर गैर-वन भूमि न मिलने का प्रमाण पत्र दिया था, लेकिन कमेटी इससे संतुष्ट नहीं हुई। कमेटी का साफ कहना था कि विकल्प तलाशने के ईमानदार प्रयास नहीं किए गए।

तकनीकी खामियों और कमियों का पुलिंदा

प्रस्ताव के खारिज होने के पीछे सिर्फ जमीन का चयन ही नहीं, बल्कि भारी प्रशासनिक और तकनीकी खामियां भी रहीं।

गलत अथॉरिटी लेटर: कागजों में आवेदक का नाम पीडब्ल्यूडी के अधिशासी अभियंता (XEN) अशोक कुमार का था, लेकिन अथॉरिटी लेटर किसी अन्य अधिकारी के नाम से अपलोड था।

संस्तुति और ब्रेकअप की कमी: प्रधान मुख्य वन संरक्षक (HoFF) की स्पष्ट संस्तुति प्रस्ताव में नहीं थी। विभिन्न कंपोनेंट्स का ब्रेकअप भी सही से नहीं भरा गया था।

अतिक्रमण की आशंका: KML (डिजिटल मैपिंग) फाइल के अध्ययन में पाया गया कि प्रस्तावित जमीन और मुख्य सड़क के बीच खाली जगह (गैप) है, जिससे भविष्य में वहां अवैध कब्जे या अतिक्रमण का खतरा पैदा हो सकता है।

अधूरा प्लान: कमेटी के सामने केवल एक ‘टेंटेटिव’ (अस्थायी) नक्शा रखा गया था, जबकि ऐसे बड़े प्रोजेक्ट के लिए विस्तृत लेआउट प्लान जरूरी होता है।

जरूरी अनुमतियों का अभाव: चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन (CWLW) द्वारा हस्ताक्षरित वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट प्लान, सॉयल कंजर्वेशन प्लान और 20 साल की प्लांटेशन स्कीम भी जमा नहीं कराई गई थी।

हाईकोर्ट को हल्द्वानी लाने की जरूरत क्यों पड़ी?

नैनीताल से हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट करने के पीछे बेहद व्यावहारिक कारण हैं। हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से दिए गए ये तर्क दिए गए थे।

मामलों और भीड़ का बढ़ता बोझ: साल 2010 में जहां हाईकोर्ट में करीब 4,000 मामले लंबित थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 64,000 से अधिक हो चुका है। मौजूदा परिसर में जजों, वकीलों और स्टाफ के बैठने के लिए जगह कम पड़ने लगी है।

वादियों की परेशानी: नैनीताल एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल है। वहां होटलों का किराया काफी महंगा है और हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है। दूर-दराज से आने वाले गरीब वादियों के लिए नैनीताल में रुकना और पहुंचना काफी खर्चीला साबित होता है।

भविष्य का विजन: हल्द्वानी के बेलबाबा में प्रस्तावित नई बिल्डिंग ‘ग्राउंड प्लस 7’ (G+7) मंजिल की बनाने की योजना थी, जिसमें पर्याप्त पार्किंग, ग्रीन बेल्ट और भविष्य के विस्तार की पूरी गुंजाइश रखी गई थी। खास बात यह थी कि इसमें कोई आवासीय निर्माण नहीं होना था, केवल प्रशासनिक और न्यायिक ब्लॉक बनने थे। इस प्रोजेक्ट से निर्माण के दौरान लगभग 5 लाख मानव दिवस और संचालन के दौरान 5.5 लाख मानव दिवस का रोजगार मिलने की उम्मीद भी थी।

पहले गौलापार का प्रस्ताव भी हो चुका है निरस्त

यह पहली बार नहीं है जब हाईकोर्ट शिफ्टिंग का प्लान अटका हो। इससे पहले गौलापार (हल्द्वानी) में हाईकोर्ट बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। लेकिन 24 जनवरी 2024 को आरईसी ने उस प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया था। गौलापार वाले पुराने प्रस्ताव में 4,238 बड़े पेड़ों को काटा जाना था और उसमें आवासीय परिसर बनाने का भी प्रावधान था, जिससे बड़े पैमाने पर जंगलों का विनाश हो रहा था। उसकी तुलना में बेलबाबा का नया प्रस्ताव काफी छोटा था, जिसमें सिर्फ 123 पेड़ कटने थे और आवासीय निर्माण हटा दिया गया था। इसके बावजूद, कानूनी और पर्यावरणीय पेंच के कारण नया प्रस्ताव भी सिरे नहीं चढ़ सका।

गेंद फिर उत्तराखंड सरकार और यूजर एजेंसी के पाले में

केंद्र सरकार की सख्ती के बाद अब गेंद एक बार फिर उत्तराखंड सरकार और यूजर एजेंसी के पाले में है। केंद्र ने साफ निर्देश दिया है कि पहले राज्य में मौजूद उपयुक्त गैर-वन भूमि (Non-Forest Land) पर इस प्रोजेक्ट को बनाने की संभावनाओं को गहराई से तलाशा जाए। जब तक सरकार बिना जंगल काटे किसी विकल्प को सामने नहीं लाती, तब तक न्याय के इस सर्वोच्च मंदिर का हल्द्वानी आगमन अधर में ही लटका रहेगा।

The post उत्तराखंड हाईकोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग पर फिर ब्रेक: केंद्र ने खारिज किया बेलबाबा का प्रस्ताव appeared first on Khabar Uttarakhand - Uttarakhand News.

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow