उत्तराखंड की सड़कें: हताशा और संघर्ष की कहानी
सोशल मीडिया पर एक वीडियो चेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो भीमताल के लोशज्ञानी गांव की है। जहां सैकड़ों वादों और दशकों के इंतजार के बाद भी जब रोड़ नहीं बन पाई। हताश होकर गांव वालों ने अपने गांव की रोड़ बनाने का बीडा अपने कंधों पर ही उठा लिया। लेकिन प्रशासन से ये …
गजब सिस्टम है भाई!, उत्तराखंड में ना खुद सड़क बनाएंगे ना बनाने देंगे
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड के भीमताल के लोशज्ञानी गांव में सैकड़ों वादों और दशकों के इंतजार के बाद भी सड़क नहीं बन पाई। गांव वालों ने हताश होकर खुद सड़क बनाने का बीड़ा उठाया, लेकिन प्रशासन ने काम को रोक दिया।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा यह वीडियो इस गंभीर मुद्दे की जड़ों को उजागर करता है। जब न जाने कितने वर्षों की अनदेखी के बाद गांववालों ने अपने कंधों पर सड़क निर्माण का बोझ उठाने का निर्णय लिया, तो प्रशासन की नींद अचानक खुली। वहां पहुंचकर प्रशासन ने नियमों का हवाला देते हुए ग्रामीणों को काम बंद करने के लिए मजबूर कर दिया।
प्रशासन ने नहीं सुना तो खुद सड़क निर्माण की ठानी
यह स्थिति केवल भीमताल की नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी ही कई समस्याएं हैं। एक बेसहारा पिता अपने बीमार बेटे को अस्पताल ले जाने में दो से चार घंटे तक की पैदल यात्रा करता है। कई बार बीमारों को अस्पताल पहुंचाने के लिए डोली या डांडी का सहारा लेना पड़ता है।
डंडों पर डांडी कंठी के सहारे चल रहा काम
कई बार ग्रामीण अपनी जान को जोखिम में डालकर लोहे के डंडों से डांडी कंठी के सहारे चलने पर मजबूर होते हैं। विकास के ये खोखले दावे कितनी गर्भवती महिलाओं के जीवन को दांव पर लगा देते हैं, जो टूटे रास्तों पर तड़प-तड़प कर अस्पताल पहुंचने से पूर्व ही दम तोड़ देती हैं।
लोग आजतक सड़क के लिए तरस रहे
युवाओं की बात करें तो उन्हें बहते पानी के ऊपर कूदकर स्कूल पहुंचना पड़ता है। कुछ बच्चों को परीक्षा देने के लिए ऊफंती नदियों को पार करना पड़ता है। गैरसैंण को देश की राजधानी बनाने का सपना देखने वाली सरकार के आस-पास के गांवों के लोग आज भी सड़क की उम्मीद में हैं। प्रतिवर्ष बड़े-बड़े वादे होते हैं कि गांव-गांव तक सड़कें बनेंगी, लेकिन हकीकत कुछ और है।
बजट आता है लेकिन विकास नहीं
सरकारी बजट का कोई कमी नहीं है, लेकिन जरूरतमंद लोगों के लिए ये बजट खोखले वादों के सिवा और कुछ नहीं है। वायरल वीडियो में बागेश्वर की एक बूढ़ी महिला के आंसू दशक भर की पीड़ा और टूटे वादों का प्रतीक हैं। यह समाज के उस सिस्टम की वास्तविकता को उजागर करता है जो सड़कों की उपलब्धियों का बखान करता है परंतु वापस धरातल पर नदारद हो जाता है।
इस प्रकार उत्तराखंड में कहीं भी सड़कें निर्माण का काम नहीं होता और प्रशासन सिर्फ वादे करता है। क्या यह विकास की परिभाषा है या हकीकत? हमें इस पर विचार करना होगा।
इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए, संबंधित अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए ताकि ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान हो सके। अधिक जानकारी के लिए, कृपया हमारे पोर्टल https://kharchaapani.com पर जाएं।
टीम खर्चा पानी - साक्षी मेहता
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