उत्तरी भारत के पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चारागाह भूमि नीलामी का विरोध, नई टिहरी में भव्य प्रदर्शन
उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन को बचाने और थौलधार ब्लॉक के राम गांव और बोर गांव की चारागाह भूमि की प्रस्तावित नीलामी को निरस्त करने की मांग को लेकर सोमवार को नई टिहरी स्थित जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में 22 गांव से आए लोगों ने प्रदर्शन किया। चारागाह भूमि की नीलामी के विरोध में नई …
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए नई टिहरी में 22 गांवों के लोगों ने सोमवार को जिलाधिकारी कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। उनका मुख्य उद्देश्य थौलधार ब्लॉक के राम गांव और बोर गांव की चारागाह भूमि की नीलामी को रद्द कराना था।
चारागाह भूमि की नीलामी के विरोध में नई टिहरी में प्रदर्शन
सोमवार को जब नई टिहरी के जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में प्रदर्शन हुआ, तब वहां 22 गांवों के प्रतिनिधियों, ग्रामीणों, पशुपालकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों के सदस्यों की भीड़ इकट्ठा हुई। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना था कि बोर और राम गांव की लगभग 1.572 हेक्टेयर चारागाह भूमि केवल उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक नहीं, बल्कि यह उनके जीवन की आधारशिला भी है। यह भूमि उनकी पशुपालन गतिविधियों और पारंपरिक संसाधनों के संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, और इसलिए इसकी नीलामी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
स्थानीय जनता के हितों को अनदेखा करने का आरोप
प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाया है कि वह स्थानीय जनता की भावनाओं और हितों को नकारते हुए चारागाह भूमि की नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में चारागाह भूमि का महत्व मैदानी इलाकों की तुलना में ज्यादा है, क्योंकि कई परिवार यहां अपने जीवनयापन के लिए पशुपालन पर निर्भर हैं। यदि यह भूमि ग्रामीणों से छिन गई, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव स्थानीय अर्थव्यवस्था और जीवनशैली पर पड़ेगा।
प्रशासन से निविदा प्रक्रिया निरस्त करने की मांग
धरना स्थल पर मौजूद जनप्रतिनिधियों का कहना था कि यह संघर्ष केवल दो गांवों की भूमि को बचाने का नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा का आंदोलन है। उन्होंने प्रशासन से निविदा प्रक्रिया को तुरंत निरस्त करने और चारागाह भूमि को संरक्षित रखने की मांग की है।
मांग पूरी न होने पर दी उग्र आंदोलन की चेतावनी
गौरतलब है कि इससे पहले सुल्याधार में आयोजित महापंचायत में 22 गांवों के लोग एकजुट होकर चारागाह भूमि बचाव आंदोलन संघर्ष समिति का गठन कर चुके हैं। समिति के अध्यक्ष और पूर्व प्रधान नत्थी सिंह कैंतुरा ने चेतावनी दी कि यदि नीलामी प्रक्रिया वापस नहीं ली जाती, तो आंदोलन तेज किया जाएगा। उन्होंने स्थानीय जनता से एकजुट रहने का आह्वान किया है। उनकी चेतावनी से ये स्पष्ट होता है कि यदि स्थिति नहीं बदली, तो भविष्य में आंदोलन और भी खतरनाक रूप ले सकता है।
इस प्रकार, उत्तराखंड की यह घटना न केवल स्थानीय लोगों की भूमि को बचाने की कोशिश है, बल्कि यह पर्यावरण और पारंपरिक संसाधनों के संरक्षण का भी महत्वपूर्ण पहलू है। सभी की यही अपेक्षा है कि प्रशासन इस मुद्दे पर सुनवाई करे और जनता की मांगों को गंभीरता से ले। उनके हितों की रक्षा करना ही असली लोकतंत्र की पहचान है।
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सादर,
टीम खर्चा पानी
श्रीमती राधिका दास
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